ब्रिटेन : चुनाव में भारतवंशी ऋषि सुनक हारे, 5 कारण जिनकी वजह से नहीं बन सके पीएम

न्यूज़ लहर संवाददाता
ब्रिटेन:ब्रिटेन का चुनाव परिणाम गुरुवार को आ रहा है। आम चुनाव में ऋषि सुनक की पार्टी हार गई है। लेकिन इतिहास में ऋषि सुनक ने पहले भारतीय मूल के प्रधानमंत्री के रूप में अपना नाम दर्ज कर लिया है। 44 साल के ऋषि सुनक की जगह लेबर पार्टी के कीर स्टार्मर नए पीएम बन सकते हैं। ऋषि सुनक ने हार मान ली है और लेबर पार्टी को जीत की बधाई दी। 14 साल के कंजर्वेटिव पार्टी के कार्यकाल में वह अंतिम प्रधानमंत्री थे। इस कार्यकाल में ब्रेग्जिट समेत कोरोना महामारी जैसे बड़े मुद्दों को देखा गया। सुनक को अक्टूबर 2022 में दिवाली के दिन कंजर्वेटिव पार्टी का नेता चुना गया था। उन्होंने 210 साल में सबसे कम उम्र के ब्रिटिश पीएम और पहले गैर श्वेत नेता के रूप में 10 डाउनिंग स्ट्रीट में प्रवेश किया।
ब्रेक्जिट ने हालात किए खराब
ब्रेक्जिट ने हालात किए खराब
साल 2016 के ब्रेक्जिट जनमत संग्रह के बाद से ब्रिटेन को गिरते जीवन स्तर की चुनौतियों से जुड़ी चिंताओं का सामना करना पड़ रहा है। मुद्रास्फीति में अस्थायी कमी के बावजूद, वास्तविक मजदूरी में गिरावट देखी जा रही है और खाद्य कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, जिससे जनता में असंतोष बढ़ रहा है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक इससे कंजर्वेटिव सरकार आधुनिक ब्रिटिश इतिहास में पहली सरकार बन गई है जिसने लोगों को पहले से भी बुरी स्थिति में पहुंचा दिया। सार्वजनिक व्यय में लगातार कटौती देखी गई। प्रसिद्ध राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा वेटिंग लिस्ट, चिकित्सकों की गिरती संख्या के कारण बुरी स्थिति में है। पेंशन मुद्रास्फीति के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहा है और सार्वजनिक आवास नष्ट हो रहे हैं।
कमजोर नेतृत्व
ब्रेग्जिट के बाद कंजर्वेटिव पार्टी को लगातार नेतृत्व परिवर्तन और घोटालों का सामना करना पड़ा। इसमें कोविड-19 प्रतिबंधों के दौरान पार्टीगेट जैसे विवाद भी शामिल हैं, जिस कारण बोरिस जॉनसन को पीएम पद छोड़ना पड़ा। उनके बाद पीएम बनीं लिज ट्रस का कार्यकाल भी 49 दिनों का रहा जिसने विफल आर्थिक कठिनाइयों को दिखाया। ब्रिटेन की दूसरी महिला पीएम थेरेसा मे ब्रेक्सिट के लिए व्यावहारिक योजना देने में विफल रहीं। 14 साल के कार्यकाल में ब्रिटिश जनता ने पांच प्रधानमंत्री देखे।
अप्रवासियों को रवांडा भेजना
प्रधानमंत्री ऋषि सुनक की कई नीतियों को लेकर लोग नाराज थे। उन्होंने अवैध आप्रवासन को अपना पसंदीदा मुद्दा बना लिया। लोगों का मानना था कि यह उनकी पार्टी के भ्रष्टाचार और आर्थिक कुप्रबंधन जैसे मुद्दों से भटकाने की कोशिश थी। बिना दस्तावेज वाले आप्रवासियों को रवांडा भेजने की उनकी नीति को कई ब्रिटिश नागरिकों ने अमानवीय माना है। इस कारण विपक्षी लेबर पार्टी को भी उनके ऊपर हमला करने का मौका मिल गया।
लेबर पार्टी के वादे ने खींचा वोट
ब्रिटेन जो कोरोना के बाद से ही एक आर्थिक संकट और महंगाई देख रहा है वहां विपक्षी लेबर पार्टी के कीर स्टार्मर ने आर्थिक विकास का वादा किया। जनता से किए स्टार्मर के कई वादे भी ऋषि सुनक की हार का कारण बन गए। उन्होंने स्वास्थ्य सेवा में बदलाव, साफ ऊर्जा का वादा जनता से किया है। लेबर ने कामकाजी लोगों के लिए टैक्स न बढ़ाने का वादा किया है। स्टार्मर ने आयकर, राष्ट्रीय बीमा या वैट में भी बढ़ोतरी न करने को कहा है।
लेबर पार्टी ने बेंच दी आत्मा
स्टार्मर के बड़े-बड़े दावों के बावजूद आलोचकों का कहना है कि उन्होंने पार्टी को चुनाव जीतने लायक बनाने के लिए लेबर पार्टी की आत्मा बेंच दी। इससे लोगों के लिए कंजर्वेटिव पार्टी के सामने एक अच्छा विकल्प मिल गया। आलोचकों का कहना है कि स्टार्मर बिना विचारधारा वाले व्यक्ति हैं जो लेबर को चुनाव जिताने के लिए कुछ भी करेंगे। स्टार्मर ने पार्टी को अपनी ज्यादातर वामपंथी और श्रमिक वर्ग परंपराओं को छोड़ दिया और राजनीतिक केंद्र में चली गई। इससे पहले पार्टी के नेता जेरेमी कॉर्बिन हथियारों की बिक्री को रिव्यू करने, अमीरों पर टैक्स लगाने की बात करते रहे हैं।