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विवाहेतर संबंध की जांच में पत्नी को पति के कॉल रिकॉर्ड और लोकेशन डिटेल्स तक पहुंच का अधिकार: दिल्ली हाईकोर्ट”

 

 

नई दिल्ली।दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और न्यायिक दृष्टिकोण से दूरगामी प्रभाव डालने वाला फैसला सुनाया है, जिसमें कहा गया है कि यदि किसी पत्नी को अपने पति पर विवाहेतर संबंध (अडल्टरी) का संदेह है, तो उसे पति और उसकी कथित प्रेमिका के कॉल डेटा रिकॉर्ड्स (CDR) और लोकेशन डिटेल्स प्राप्त करने का अधिकार है। अदालत ने कहा कि ये डेटा वस्तुनिष्ठ होते हैं और विवाह संबंधी विवादों में सत्यापन और न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक साक्ष्य का कार्य करते हैं।

यह फैसला जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर की पीठ ने सुनाया, जब उन्होंने उस याचिका पर विचार किया जिसमें पति और उसकी कथित प्रेमिका ने फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। फैमिली कोर्ट ने 29 अप्रैल 2025 को दिए गए अपने आदेश में पत्नी की याचिका स्वीकार कर ली थी और टेलिकॉम कंपनियों तथा पुलिस को निर्देश दिया था कि जनवरी 2020 से अब तक की कॉल रिकॉर्ड्स और लोकेशन डिटेल्स सुरक्षित रखी जाएं।

पत्नी ने अपनी याचिका में कहा था कि उसके पति के विवाहेतर संबंधों के पर्याप्त संदेह हैं, लेकिन उसके पास प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं हैं। उसने यह भी तर्क दिया कि इन तकनीकी रिकॉर्ड्स के बिना अपने आरोपों को साबित करना असंभव होगा। याचिका में यह भी बताया गया कि पति और उसकी कथित प्रेमिका कई बार एक साथ यात्रा कर चुके हैं और उनका संबंध वर्षों से चल रहा है।

इसके खिलाफ पति की कथित प्रेमिका और स्वयं पति ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की और कहा कि यह आदेश उनके मौलिक गोपनीयता अधिकार का उल्लंघन है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी का मकसद उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित करना और सामाजिक रूप से बदनाम करना है। उनका कहना था कि केवल कॉल डेटा या लोकेशन से विवाहेतर संबंध साबित नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए 2003 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले शारदा बनाम धर्मपाल का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि यदि न्यायिक प्रक्रिया के लिए आवश्यक हो तो सीमित रूप में व्यक्तिगत गोपनीयता में हस्तक्षेप किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि CDR और टावर लोकेशन डेटा वस्तुनिष्ठ साक्ष्य होते हैं और इनका उपयोग निजी संवादों की सामग्री का उल्लंघन किए बिना किया जा सकता है।

32-पृष्ठ के फैसले में हाईकोर्ट ने लिखा,
“यह डेटा केवल न्यायिक उद्देश्य के लिए प्रयुक्त किया जाएगा और किसी प्रकार की खोजी प्रक्रिया या अटकल के आधार पर नहीं लिया गया है। ये रिकॉर्ड्स अदालत में तथ्यों की पुष्टि करने के लिए सहायक सिद्ध हो सकते हैं।”

इस निर्णय को विशेषज्ञों ने भी पारिवारिक न्यायिक प्रणाली में एक संतुलनकारी दृष्टिकोण के रूप में सराहा है। यह फैसला पारदर्शिता और निष्पक्षता को बढ़ावा देता है और सुनिश्चित करता है कि कोई भी पक्ष केवल आरोपों के आधार पर पीड़ित न बने। साथ ही, यह आदेश यह भी सुनिश्चित करता है कि डिजिटल साक्ष्य का दुरुपयोग न हो और डेटा केवल न्यायिक प्रक्रिया तक सीमित रहे।

दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले को भविष्य के पारिवारिक विवादों और तलाक संबंधी मुकदमों में एक मार्गदर्शक के रूप में देखा जा रहा है, जहां डिजिटल तकनीक के माध्यम से जुटाए गए तथ्यों को निर्णायक साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। यह फैसला स्पष्ट करता है कि न्याय की प्रक्रिया में केवल आरोप नहीं, बल्कि वस्तुनिष्ठ प्रमाण ही निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

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