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गोल्डन ऑवर में प्राथमिक उपचार और एंबुलेंस की भूमिका अहम, संतोष कुमार ने बताया नेक मददगारों का कानूनी अधिकार
जमशेदपुर : सड़क दुर्घटना के बाद घायल व्यक्ति के लिए शुरुआती कुछ मिनट जिंदगी और मौत के बीच का अंतर साबित हो सकते हैं। ऐसे समय में घटनास्थल पर मौजूद लोगों की थोड़ी सी पहल भी किसी की जान बचा सकती है। इसके बावजूद कानूनी कार्रवाई और पुलिस की पूछताछ के डर से कई लोग मदद के लिए आगे नहीं आते। इसी झिझक को दूर करने और लोगों को आपातकालीन परिस्थितियों के लिए तैयार करने के उद्देश्य से एमडीडीटीआई में रेलकर्मियों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया।
कार्यक्रम में सिविल डिफेंस इंस्पेक्टर एवं राष्ट्रपति सम्मानित सदस्य संतोष कुमार ने कहा कि सड़क दुर्घटना केवल एक व्यक्ति को प्रभावित नहीं करती, बल्कि इसका असर पूरे परिवार और समाज पर पड़ता है। दुर्घटना के बाद गोल्डन ऑवर में समय पर प्राथमिक उपचार और चिकित्सा सहायता मिलने से कई जानें बचाई जा सकती हैं।
प्रशिक्षण के दौरान रेलकर्मियों को सड़क दुर्घटनाओं के कारण, घटनास्थल पर बचाव के तरीके, सीपीआर, प्राथमिक उपचार, एंबुलेंस सेवा और गुड समैरिटन यानी नेक मददगार की भूमिका के बारे में बताया गया।
इन गलतियों से बढ़ता है सड़क हादसों का खतरा
संतोष कुमार ने बताया कि तेज रफ्तार, वाहन चलाते समय मोबाइल का इस्तेमाल, नशे में ड्राइविंग, थकान या नींद की अवस्था में वाहन चलाना और यातायात नियमों की अनदेखी दुर्घटनाओं के प्रमुख कारण हैं। हेलमेट और सीट बेल्ट नहीं लगाना, खराब मौसम तथा सड़कों की खराब स्थिति भी हादसों का खतरा बढ़ाती है।
उन्होंने कहा कि दुर्घटना के बाद सबसे पहले घटनास्थल को सुरक्षित करना, आपातकालीन सहायता बुलाना और घायल की स्थिति का आकलन करना चाहिए। अत्यधिक रक्तस्राव को नियंत्रित करना और जरूरत पड़ने पर प्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा सीपीआर देना जीवनरक्षक हो सकता है। सिर या रीढ़ की चोट की आशंका होने पर घायल को बिना जरूरत हिलाने या खींचने से बचना चाहिए।
मदद करने वालों को कानूनी कार्रवाई का डर नहीं
प्रशिक्षण में नेक मददगारों के कानूनी अधिकारों पर भी विशेष जोर दिया गया। संतोष कुमार ने मोटर वाहन अधिनियम की धारा 134ए का उल्लेख करते हुए बताया कि दुर्घटना में घायल व्यक्ति की स्वेच्छा से सहायता करने वालों को कानून के तहत संरक्षण दिया गया है।
उन्होंने कहा कि नेक मददगार को सामान्यतः अनावश्यक पूछताछ, व्यक्तिगत जानकारी देने या गवाह बनने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। वह अपनी इच्छा से गवाही देने का निर्णय ले सकता है। लागू प्रावधानों के अनुसार वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से भी गवाही देने की सुविधा हो सकती है।
घायल को अस्पताल पहुंचाने वाले व्यक्ति पर इलाज का खर्च उठाने या अस्पताल की औपचारिकताएं पूरी करने की जिम्मेदारी भी नहीं होती। इसलिए कानूनी प्रक्रिया के डर से किसी घायल की मदद करने से पीछे नहीं हटना चाहिए।
राहवीर योजना के तहत मिलती है प्रोत्साहन राशि
संतोष कुमार ने सड़क दुर्घटना पीड़ितों की मदद करने वाले लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए संचालित राहवीर योजना की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि योजना के तहत पात्र नेक मददगारों को प्रोत्साहन राशि और प्रशस्ति पत्र देने का प्रावधान है। इसके अलावा सड़क दुर्घटना पीड़ितों के कैशलेस उपचार की सरकारी व्यवस्था के बारे में भी जानकारी दी गई। पात्र मामलों में निर्धारित शर्तों के अनुसार उपचार की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है।
उन्होंने गोल्डन ऑवर का महत्व समझाते हुए कहा कि दुर्घटना के बाद जल्द चिकित्सा सहायता पहुंचाना जरूरी है। प्राथमिक उपचार, घायलों की स्थिति के अनुसार उपचार की प्राथमिकता तय करने और एंबुलेंस सेवा के बेहतर समन्वय से राहत एवं बचाव कार्य को प्रभावी बनाया जा सकता है।
मॉक ड्रिल में सीपीआर और प्राथमिक उपचार का अभ्यास
कार्यक्रम में डेमोंस्ट्रेटर अनिल कुमार सिंह ने सीपीआर देने, बैंडेज लगाने, फ्रैक्चर की स्थिति में प्रभावित अंग को स्थिर रखने और फायर एक्सटिंग्विशर के इस्तेमाल का व्यावहारिक प्रदर्शन किया। मॉक ड्रिल के माध्यम से रेलकर्मियों को आपातकालीन स्थिति में त्वरित और सुरक्षित तरीके से कार्रवाई करने का अभ्यास भी कराया गया।
इस प्रशिक्षण में रेलवे के कैरेज एंड वैगन, इंजीनियरिंग, ऑपरेटिंग, कमर्शियल और लोको शेड विभाग के कुल 70 रेलकर्मियों ने हिस्सा लिया। एमडीडीटीआई के प्रिंसिपल ने रेल सिविल डिफेंस टीम के लगातार प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने टीम को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित भी किया।
कार्यक्रम का उद्देश्य रेलकर्मियों को सड़क दुर्घटना जैसी आपातकालीन परिस्थितियों में सजग और जिम्मेदार नागरिक बनाना था, ताकि जरूरत के समय उनकी पहल से किसी की जिंदगी बचाई जा सके।

