NEWS LAHAR.IN | विशेष आलेख
शक्ति की उपासना, आस्था और आध्यात्मिक चेतना का पर्व है शारदीय नवरात्र
शारदीय नवरात्र हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह पर्व मां दुर्गा की आराधना, शक्ति की उपासना और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होने वाले नवरात्र में नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। देशभर में भक्त श्रद्धा और उत्साह के साथ मां की आराधना करते हैं। मंदिरों से लेकर घरों और भव्य पूजा पंडालों तक भक्तिमय वातावरण छा जाता है।
नौ स्वरूपों में होती है मां दुर्गा की पूजा
नवरात्र के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विशेष पूजा की जाती है। प्रथम दिन मां शैलपुत्री, दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी, तीसरे दिन मां चंद्रघंटा, चौथे दिन मां कूष्मांडा, पांचवें दिन मां स्कंदमाता, छठे दिन मां कात्यायनी, सातवें दिन मां कालरात्रि, आठवें दिन मां महागौरी और नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की आराधना की जाती है।
धार्मिक मान्यता है कि मां के इन नौ स्वरूपों की पूजा करने से भक्तों को साहस, धैर्य, ज्ञान, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा की प्रेरणा मिलती है। नवरात्र के दौरान श्रद्धालु व्रत रखते हैं, दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं और मां के जयकारों से वातावरण को भक्तिमय बनाते हैं।
महिषासुर पर विजय की कथा से जुड़ा है पर्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महिषासुर नामक असुर के अत्याचारों से जब देवता और संसार त्रस्त हो गए, तब देवी दुर्गा ने उसका संहार किया। मां दुर्गा की यह विजय अन्याय, अहंकार और अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक मानी जाती है। इसी कारण नवरात्र में मां दुर्गा के शक्ति स्वरूप की विशेष आराधना की जाती है।
यह पर्व लोगों को संदेश देता है कि जीवन में कितनी भी कठिन परिस्थितियां क्यों न आएं, सत्य, साहस और धैर्य के साथ उनका सामना करना चाहिए।
कलश स्थापना से शुरू होती है पूजा
शारदीय नवरात्र के पहले दिन विधि-विधान से कलश स्थापना की जाती है। भक्त घरों और पूजा स्थलों में स्वच्छता के साथ पूजा की तैयारी करते हैं। मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित कर दीप प्रज्वलित किया जाता है और मंत्रोच्चार के साथ पूजा-अर्चना की जाती है।
नवरात्र के दौरान लाल चुनरी, पुष्प, नारियल, फल और विभिन्न पूजन सामग्रियों से मां का श्रृंगार किया जाता है। कई श्रद्धालु पूरे नौ दिनों तक व्रत रखते हैं, जबकि कुछ लोग प्रथम और अंतिम दिन उपवास करते हैं। अष्टमी और नवमी के अवसर पर कन्या पूजन की परंपरा भी निभाई जाती है।
पूजा पंडालों में दिखती है आस्था और संस्कृति की झलक
शारदीय नवरात्र के दौरान विभिन्न शहरों और गांवों में भव्य दुर्गा पूजा पंडाल बनाए जाते हैं। आकर्षक सजावट, विद्युत रोशनी, धार्मिक कलाकृतियां और मां दुर्गा की मनमोहक प्रतिमाएं श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं। पूजा पंडाल केवल धार्मिक आस्था के केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक परंपराओं के प्रतीक भी हैं।
झारखंड के जमशेदपुर सहित विभिन्न क्षेत्रों में दुर्गा पूजा का विशेष उत्साह देखने को मिलता है। पूजा समितियां पंडाल निर्माण, साफ-सफाई, सुरक्षा और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए तैयारियां करती हैं। दुर्गा पूजा के अवसर पर परिवारों और मित्रों के साथ पूजा पंडालों में दर्शन करने की परंपरा लोगों को आपस में जोड़ती है।
नवरात्र का आध्यात्मिक संदेश
शारदीय नवरात्र केवल पूजा और व्रत का पर्व नहीं है, बल्कि आत्मशुद्धि, अनुशासन और आत्मबल बढ़ाने का अवसर भी है। यह पर्व हमें अपने भीतर मौजूद क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या और नकारात्मक विचारों पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा देता है।
मां दुर्गा का प्रत्येक स्वरूप जीवन के किसी न किसी गुण का संदेश देता है। मां की आराधना के साथ जरूरतमंदों की सहायता करना, महिलाओं का सम्मान करना, समाज में सद्भाव बनाए रखना और अन्याय के विरुद्ध खड़े होना भी शक्ति उपासना की भावना को सार्थक बनाता है।
विजयादशमी के साथ होता है पर्व का समापन
नौ दिनों की आराधना के बाद विजयादशमी का पर्व मनाया जाता है। यह दिन विजय, साहस और धर्म की स्थापना का प्रतीक है। कई स्थानों पर दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है, जबकि कुछ क्षेत्रों में नवरात्र की परंपराओं के अनुसार अलग-अलग तिथियों पर विसर्जन होता है। विजयादशमी पर रावण दहन की परंपरा भी बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश देती है।
शारदीय नवरात्र का सार यही है कि शक्ति की उपासना केवल मंदिरों तक सीमित न रहे, बल्कि हमारे आचरण, विचारों और कर्मों में भी दिखाई दे। मां दुर्गा से यही प्रार्थना है कि सभी के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और सद्भाव बना रहे।
जय माता दी!
