NEWS LAHAR REPORTER
रांची : झारखंड की पहचान उसके घने जंगलों और समृद्ध वन संपदा से है, लेकिन इन्हीं जंगलों की निगरानी और संरक्षण के लिए जिम्मेदार वन विभाग मानव संसाधन की कमी से जूझ रहा है। अधिकारियों और फील्ड स्तर के कर्मियों के कई पद लंबे समय से रिक्त हैं। इसका असर वन क्षेत्रों की निगरानी, पौधारोपण, पौधों के संरक्षण, अतिक्रमण की रोकथाम और प्राकृतिक वनों के पुनर्जनन पर पड़ रहा है।
रिक्त पदों के कारण पैदा हुई प्रशासनिक कमी को तत्काल संभालने के लिए प्रधान मुख्य वन संरक्षक ने नौ वन क्षेत्र पदाधिकारियों (आरएफओ) और सहायक वन संरक्षकों (एसीएफ) को अतिरिक्त प्रभार सौंपा है। 18 सितंबर, 2026 को जारी आदेश के तहत इन अधिकारियों को अपने मूल दायित्व के साथ अतिरिक्त वन प्रक्षेत्र और वन प्रमंडल का काम भी देखना होगा। यह व्यवस्था नियमित नियुक्तियां होने तक अस्थायी रूप से लागू रहेगी।
विभाग के अनुसार, अतिरिक्त प्रभार की व्यवस्था जनप्रतिनिधियों और क्षेत्रीय पदाधिकारियों से मिले सुझावों के बाद की गई है। संबंधित पद पर नियमित अधिकारी की नियुक्ति होते ही अतिरिक्त प्रभार स्वत: समाप्त हो जाएगा। जरूरत पड़ने पर सरकार या प्रधान मुख्य वन संरक्षक इस व्यवस्था में बदलाव भी कर सकते हैं।
एक अधिकारी, कई प्रक्षेत्रों की जिम्मेदारी
अतिरिक्त प्रभार की सूची यह बताती है कि रिक्त पदों के कारण अधिकारियों पर जिम्मेदारियों का बोझ किस तरह बढ़ा है। पश्चिमी सिंहभूम से लेकर संताल परगना तक कई वन प्रक्षेत्रों की जिम्मेदारी पहले से पदस्थ अधिकारियों को दी गई है।
जितेंद्र प्रसाद सिंह, वन क्षेत्र पदाधिकारी, नोवामुंडी को सोंगर वन प्रक्षेत्र, चक्रधरपुर के साथ कोटगढ़, कुंडलीगुटू तथा शोध एवं मूल्यांकन प्रक्षेत्र का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। रामनन्दन राम, वन क्षेत्र पदाधिकारी, कोयना को बेरोन, आनंदपुर, गुदड़ी और सारंडा वन प्रमंडल के संबंधित प्रक्षेत्रों की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
बबलू कुमार देहरी, वन क्षेत्र पदाधिकारी, पाकुड़ को अमड़ापाड़ा और हिरणपुर वन प्रक्षेत्र का अतिरिक्त प्रभार मिला है। देवेंद्र प्रसाद, वन क्षेत्र पदाधिकारी, कुजू को सामाजिक वानिकी प्रक्षेत्र, विष्णुगढ़ और पेटरवार का काम भी देखना होगा।
इसी तरह सुरेश राम, सहायक वन संरक्षक को दारू और हंटरगंज वन प्रक्षेत्र, अनिल कुमार को चास वन प्रक्षेत्र और बोकारो वन प्रमंडल तथा कुमारी मित्ती कुमारी को देवघर प्रादेशिक प्रक्षेत्र और सामाजिक वानिकी प्रक्षेत्र मधुपुर व सारठ का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है।
लेखर राम रवि, वन क्षेत्र पदाधिकारी, दुमका को हिजला पूर्वी वन प्रक्षेत्र तथा मृत्युंजय कुमार, वन क्षेत्र पदाधिकारी, जामताड़ा को सामाजिक वानिकी प्रक्षेत्र शिकारीपाड़ा और दुमका का अतिरिक्त दायित्व सौंपा गया है।
यह व्यवस्था विभाग के लिए तत्काल राहत का माध्यम जरूर है, लेकिन अतिरिक्त जिम्मेदारियों के साथ अधिकारियों के सामने अपने मूल क्षेत्र के कामकाज को भी सुचारु रखने की चुनौती बनी रहेगी।
रांची में 33 पद वर्षों से रिक्त
राज्य में वन विभाग के रिक्त पदों की समस्या का असर राजधानी रांची में भी गंभीर रूप से दिखाई दे रहा है। रांची जिले में एसीएफ, फॉरेस्ट रेंज ऑफिसर (आरएफओ) और फॉरेस्टर के कुल 33 पद रिक्त हैं। इनमें एसीएफ का पद वर्ष 2023 से, फॉरेस्टर के पद वर्ष 2024 से और आरएफओ के पद इसी वर्ष से रिक्त बताए गए हैं। यानी वन प्रबंधन के महत्वपूर्ण पदों पर लंबे समय से नियमित अधिकारी उपलब्ध नहीं हैं।
इन पदों पर नियुक्ति के लिए प्रतियोगी परीक्षाएं आयोजित की गई थीं। सफल अभ्यर्थियों के साक्षात्कार की प्रक्रिया भी पूरी हो चुकी थी। लेकिन प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर विवाद, छात्रों के आंदोलन और उसके बाद न्यायालयी प्रक्रिया के कारण नियुक्तियां आगे नहीं बढ़ सकीं।
वन विभाग में इन पदों की भूमिका केवल कार्यालय तक सीमित नहीं है। एसीएफ, आरएफओ और फॉरेस्टर फील्ड में वन क्षेत्रों की निगरानी, पौधारोपण की योजना, पौधों की देखभाल, वन भूमि की सुरक्षा, अतिक्रमण की निगरानी और वन संरक्षण से जुड़े कामों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके पद खाली रहने का सीधा असर जमीनी स्तर के काम पर पड़ता है।
फॉरेस्ट गार्ड के भरोसे जंगलों की निगरानी
रांची के मंडल वन अधिकारी (डीएफओ) श्रीकांत वर्मा के अनुसार अधिकारियों और फील्ड स्तर के कर्मचारियों की कमी के कारण वनरोपण और संरक्षण कार्य में काफी परेशानी हो रही है। फिलहाल विभाग के पास मुख्य रूप से फॉरेस्ट गार्ड ही उपलब्ध हैं।
फॉरेस्ट गार्ड के माध्यम से वन क्षेत्रों की सुरक्षा और निगरानी तो की जा रही है लेकिन बड़े क्षेत्र में पौधारोपण और उसकी नियमित देखभाल के लिए केवल सीमित संख्या में फॉरेस्ट गार्ड पर्याप्त नहीं हैं। डीएफओ के अनुसार गुमला और अन्य पड़ोसी जिलों से कर्मचारियों को बुलाकर रांची के वन क्षेत्रों की नियमित निगरानी कराना भी व्यावहारिक नहीं है।
ऐसे में विभाग को उपलब्ध मानव संसाधन के आधार पर प्राथमिकताएं तय करनी पड़ रही हैं। संवेदनशील स्थलों की निगरानी, पुराने पौधों की सुरक्षा और जरूरी क्षेत्रों में विभागीय गतिविधियों को प्राथमिकता दी जा रही है।
20 प्रतिशत पौधारोपण स्थल संवेदनशील
रांची जिले में वनरोपण के लिए चिह्नित स्थलों में करीब 20 प्रतिशत साइट संवेदनशील हैं। इन क्षेत्रों में पौधों को नुकसान पहुंचने का खतरा अधिक रहता है।
डीएफओ के अनुसार, कुछ जगहों पर असामाजिक तत्व पौधों को उखाड़कर ले जाते हैं। कई बार पौधों की सुरक्षा के लिए लगाए गए प्लास्टिक या लोहे के ट्री गार्ड भी हटा दिए जाते हैं। ट्री गार्ड नहीं रहने पर मवेशियों के खुले पौधों को नुकसान पहुंचाने की आशंका बढ़ जाती है।
इस तरह एक पौधे को लगाने के बाद उसकी सुरक्षा के लिए लगातार निगरानी की जरूरत पड़ती है लेकिन जब फील्ड स्तर पर अधिकारी और कर्मचारी ही पर्याप्त संख्या में उपलब्ध न हों, तो प्रत्येक पौधारोपण स्थल की निगरानी करना मुश्किल हो जाता है।
यही वजह है कि विभाग फिलहाल नई साइटों पर पौधारोपण बढ़ाने के बजाय पहले से लगाए गए पौधों को बचाने और उनकी देखभाल को प्राथमिकता दे रहा है। डीएफओ और विभागीय कर्मचारी समय-समय पर इन स्थलों का निरीक्षण भी कर रहे हैं।
अतिक्रमणमुक्त 63 एकड़ जमीन पर अब जंगल बसाने की तैयारी
मानव संसाधन की कमी के बावजूद वन विभाग नए क्षेत्रों को वन क्षेत्र के रूप में विकसित करने की तैयारी कर रहा है। रांची जिले में कई गैरमजरूआ जमीन को अतिक्रमणमुक्त कराया गया है। इनमें बाढ़ू की 36 एकड़ और ओरमांझी के गुडू की करीब 27 एकड़ जमीन शामिल है। कुल करीब 63 एकड़ जमीन को वनरोपण के लिए इस्तेमाल करने की योजना है। इन जमीनों पर पौधारोपण कर हरित क्षेत्र विकसित किया जाना है लेकिन पौधे लगाने के बाद उनकी सुरक्षा और नियमित देखभाल सबसे बड़ी आवश्यकता होगी। ऐसे में इन क्षेत्रों में वनरोपण के साथ पर्याप्त फील्ड मानव संसाधन की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण होगी।
सिर्फ पौधे लगाना नहीं, बचाना भी बड़ी चुनौती
वनरोपण के काम को केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं किया जा सकता। पौधे लगाने के बाद कई वर्षों तक उनकी देखभाल, सिंचाई, सुरक्षा, ट्री गार्ड की निगरानी और प्राकृतिक परिस्थितियों से बचाव जरूरी होता है। रांची की स्थिति में यही चुनौती सबसे ज्यादा दिखाई दे रही है। विभाग के सामने एक तरफ नए क्षेत्रों में वन क्षेत्र विकसित करने का लक्ष्य है, तो दूसरी तरफ पहले से लगाए गए पौधों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी भी है। संवेदनशील साइटों पर पौधों और ट्री गार्ड की चोरी या क्षति के कारण विभाग को अतिरिक्त निगरानी करनी पड़ती है। मानव संसाधन की कमी के कारण विभाग को अपनी प्राथमिकताएं बदलनी पड़ रही हैं। नई जगहों पर पौधारोपण से अधिक जोर अब मौजूदा पौधों के संरक्षण पर है।
अतिरिक्त प्रभार से फिलहाल चल रहा काम
राज्य सरकार और वन विभाग के सामने फिलहाल दो स्तर की चुनौती है। तत्काल जरूरत को देखते हुए नौ अधिकारियों को अतिरिक्त प्रभार देकर अलग-अलग वन प्रक्षेत्रों और प्रमंडलों का काम चलाया जा रहा है। वहीं, रांची समेत अन्य जिलों में रिक्त पदों पर नियमित नियुक्ति की प्रतीक्षा है। अतिरिक्त प्रभार की व्यवस्था से प्रशासनिक कामकाज को जारी रखने में मदद मिल सकती है लेकिन जिन अधिकारियों को यह जिम्मेदारी दी गई है, उन्हें अपने मूल कार्यक्षेत्र के साथ अतिरिक्त क्षेत्रों की भी निगरानी करनी होगी।
रांची में स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण है। एक ओर हजारों हेक्टेयर भूमि पर वनरोपण किया जा रहा है, अतिक्रमणमुक्त जमीन पर नए वन क्षेत्र विकसित करने की तैयारी है और प्राकृतिक वनों के संरक्षण की जिम्मेदारी है। दूसरी ओर 33 महत्वपूर्ण पद रिक्त हैं। फिलहाल विभाग उपलब्ध मानव संसाधन के सहारे संवेदनशील पौधारोपण स्थलों की निगरानी, पुराने पौधों के संरक्षण, वन क्षेत्रों की सुरक्षा और अतिक्रमणमुक्त जमीन पर प्रस्तावित वनरोपण की तैयारी कर रहा है। ऐसे में वन विभाग के सामने सबसे बड़ी जरूरत केवल नए पौधे लगाने की नहीं, बल्कि लगाए गए पौधों को सुरक्षित रखते हुए उन्हें जंगल में बदलने की भी है।

