NEWS LAHAR REPORTER
नई दिल्ली : भारतीय रुपया जब अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है तो अक्सर इसे अर्थव्यवस्था की कमजोरी के संकेत के रूप में देखा जाता है। हालांकि भारत के आर्थिक इतिहास में ऐसे मौके भी आए हैं जब सरकार ने परिस्थितियों के दबाव में जानबूझकर रुपए का अवमूल्यन किया। ऐसा ही एक बड़ा फैसला 6 जून 1966 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लिया था, जब भारतीय रुपए का 36.5 प्रतिशत अवमूल्यन कर दिया गया था।
इस निर्णय के बाद एक अमेरिकी डॉलर की कीमत 4.76 रुपए से बढ़कर 7.50 रुपए हो गई। यानी डॉलर की कीमत रुपए के मुकाबले 57.4 प्रतिशत बढ़ गई थी। यह फैसला ऐसे समय लिया गया था जब भारत आर्थिक संकट, खाद्यान्न की भारी कमी और विदेशी मुद्रा भंडार की गंभीर चुनौती से जूझ रहा था।
युद्ध और सूखे ने बढ़ाई आर्थिक मुश्किलें
1962 में चीन और 1965 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्धों ने भारत की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डाला था। इसके साथ ही देश में पड़े भीषण सूखे के कारण खाद्यान्न उत्पादन में भारी गिरावट आई। हालात ऐसे बन गए कि भारत को बड़े पैमाने पर गेहूं और चावल का आयात करना पड़ा।
1965 में भारत का आयात 2,194 करोड़ रुपए था, जबकि निर्यात केवल 1,264 करोड़ रुपए रहा। इस प्रकार व्यापार घाटा बढ़कर 930 करोड़ रुपए तक पहुंच गया था। विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से घट रहा था और देश को बाहरी सहायता की आवश्यकता पड़ रही थी।
विश्व बैंक और अमेरिका का था दबाव
अर्थशास्त्रियों के अनुसार उस समय विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों ने भारत पर रुपए का अवमूल्यन करने का दबाव बनाया था। भारत को खाद्यान्न और आर्थिक सहायता के लिए अमेरिका की मदद की जरूरत थी। अमेरिका ने अपने “फूड फॉर पीस” कार्यक्रम के तहत भारत को लाखों टन गेहूं और चावल उपलब्ध कराया तथा आर्थिक सहायता भी दी।
तत्कालीन वित्त मंत्री सचिन्द्र चौधरी ने संसद में स्वीकार किया था कि निकट भविष्य में भारत विदेशी सहायता के बिना अपनी जरूरतें पूरी नहीं कर सकता।
फैसले पर हुआ था तीखा विरोध
रुपए के अवमूल्यन के फैसले की देशभर में कड़ी आलोचना हुई थी। विपक्षी दलों के साथ-साथ कांग्रेस के भीतर भी इसका विरोध हुआ। तत्कालीन वाणिज्य मंत्री मनुभाई शाह ने इस कदम को गलत बताते हुए कहा था कि केवल रुपए को कमजोर करने से निर्यात में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं होगी।
उन्होंने अवमूल्यन के कुछ ही महीनों बाद निर्यात सब्सिडी बहाल कर दी और सार्वजनिक रूप से इसे स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी आर्थिक भूल करार दिया।
क्या अवमूल्यन सफल रहा?
हालांकि कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अल्पकाल में विवादित रहने के बावजूद इस फैसले का मध्यम अवधि में सकारात्मक असर देखने को मिला। अवमूल्यन के बाद भारतीय निर्यात में तेजी आई और आयात पर नियंत्रण हुआ। 1970-71 तक व्यापार घाटा काफी हद तक सिमट गया था।
विश्लेषकों का कहना है कि 1991 के आर्थिक संकट के दौरान भी रुपए के अवमूल्यन और आर्थिक सुधारों ने भारत की अर्थव्यवस्था को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
सोवियत संघ हुआ था नाराज
शीत युद्ध के दौर में भारत को सोवियत संघ का करीबी माना जाता था। ऐसे में रुपए के अवमूल्यन को सोवियत नेतृत्व ने पश्चिमी देशों की ओर भारत के झुकाव के रूप में देखा। सोवियत प्रधानमंत्री एलेक्सी कोस्यगिन ने इसे बड़ी भूल बताया था। हालांकि बाद में सोवियत संघ ने भारत को सैन्य और आर्थिक सहायता देना जारी रखा।
आज भी जारी है बहस
1966 का रुपए अवमूल्यन केवल एक आर्थिक फैसला नहीं था, बल्कि यह भारत की आर्थिक संप्रभुता, विदेशी सहायता, वैश्विक दबाव और विकास मॉडल को लेकर राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया था। आज भी अर्थशास्त्रियों के बीच इस बात पर मतभेद है कि यह कदम मजबूरी थी या दूरदर्शी आर्थिक सुधार।

