NEWS LAHAR REPORTER
रात में 181.09 मीटर से सुबह 180.98 मीटर पहुंचा जलस्तर, 2 से 3 फीट पानी में डूबी धान की फसल; किसानों की चिंता बरकरार
*सरायकेला।* चांडिल डैम के जलस्तर में बीती रात से मामूली गिरावट दर्ज की गई है, जिससे किसानों को थोड़ी राहत जरूर मिली है, लेकिन खेतों में जमा पानी ने उनकी परेशानी अभी कम नहीं की है। गुरुवार रात 10 बजे चांडिल डैम का जलस्तर *181.09 मीटर RL* दर्ज किया गया था, जो शुक्रवार सुबह 6 बजे घटकर *180.98 मीटर RL* हो गया। यानी करीब आठ घंटे में जलस्तर में *11 सेंटीमीटर की कमी* दर्ज की गई।
जलस्तर में गिरावट के बावजूद चांडिल डैम के आसपास के निचले इलाकों और खेतों में अब भी *2 से 3 फीट तक पानी* जमा है। इससे धान की फसल को भारी नुकसान की आशंका जताई जा रही है। किसानों का कहना है कि यदि खेतों से जल्द पानी नहीं निकला तो लंबे समय तक पानी में डूबी धान की फसल सड़ सकती है और उत्पादन पूरी तरह प्रभावित हो सकता है।
40 से अधिक गांवों के खेत प्रभावित
चांडिल डैम के बढ़े जलस्तर और जलजमाव का असर *कुकड़ू, नीमडीह, चांडिल और ईचागढ़ प्रखंडों* के 40 से अधिक गांवों पर पड़ा है। कुकड़ू प्रखंड के बांदाबीर, केंदाआन्दा, आदारडीह, चौका, कारकीडीह, चानो और चोराटखाल समेत कई गांव प्रभावित बताए जा रहे हैं।
वहीं नीमडीह प्रखंड के हुटू, आंडा, तिलाईटांड़, कल्याणपुर, लावा और सीमा सहित अन्य गांवों के खेतों में भी पानी जमा है। चांडिल प्रखंड के रसुनिया, हाथीनादा, रूयानी, पियालडीह, बोराबिंदा, केशरगड़िया, डिमुडीह समेत कई गांवों में जलजमाव की स्थिति बनी हुई है।
ईचागढ़ प्रखंड के दियाडीह, रुगड़ी, खोकरो, मैसाढ़ा, गाराडीह, मातकमडीह, लोपसोडीह, छोटा आमड़ा, हुटुप, ईचागढ़, पातकुम, हुरलूंग, बाबूचामदा और कालीचामदा समेत कई गांवों के किसान भी प्रभावित हैं।
11 सेंटीमीटर की गिरावट राहत नहीं : राकेश रंजन महतो
विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन के अध्यक्ष *राकेश रंजन महतो* ने कहा कि डैम के जलस्तर में 11 सेंटीमीटर की गिरावट को केवल आंकड़ों में राहत माना जा सकता है, लेकिन खेतों में जब तक पानी जमा है, तब तक किसानों के लिए वास्तविक राहत नहीं है। उन्होंने कहा कि किसानों की असली चिंता खेतों में खड़ी धान की फसल को लेकर है।
उन्होंने प्रशासन के सामने जलस्तर प्रबंधन और फसल नुकसान को लेकर तीन प्रमुख सवाल उठाए हैं।
*पहला सवाल*—डैम का जलस्तर बढ़ने से यदि खेत डूबते हैं तो जलस्तर प्रबंधन की जिम्मेदारी किसकी है?
*दूसरा सवाल*—पानी में डूबकर खराब हो रही फसल का सर्वे और नुकसान का आधिकारिक आकलन कौन करेगा?
*तीसरा सवाल*—फसल बर्बाद होने की स्थिति में किसानों को हुए नुकसान की भरपाई कौन करेगा और इसकी जवाबदेही किसकी तय होगी?
आपात स्थिति में अफसरों से संपर्क नहीं होने का आरोप
राकेश रंजन महतो ने आरोप लगाया कि खेतों में पानी भरने के बाद जब किसान अपनी समस्या लेकर अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश करते हैं तो कई बार मुख्य अभियंता और कार्यपालक अभियंता से संपर्क नहीं हो पाता। उन्होंने सवाल उठाया कि आपात स्थिति में यदि किसानों की बात अधिकारियों तक नहीं पहुंचती है तो वे अपनी समस्या किसके सामने रखें।
उन्होंने प्रशासन से मांग की कि चांडिल परियोजना क्षेत्र के लिए *इमरजेंसी हेल्पलाइन और एक नोडल अधिकारी* की घोषणा की जाए, ताकि जलस्तर बढ़ने या खेतों में पानी भरने की स्थिति में किसान तत्काल सूचना दे सकें।
पुरस्कार से ज्यादा जरूरी खेतों की सुरक्षा
विस्थापित अधिकार मंच ने कहा कि चांडिल परियोजना को मिले पुरस्कार और उपलब्धियां अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन परियोजना की वास्तविक सफलता का आकलन उन किसानों और विस्थापित परिवारों की स्थिति से भी किया जाना चाहिए, जिनकी जमीन और फसल जलजमाव से प्रभावित होती है।
मंच का कहना है कि किसी भी सिंचाई या जल परियोजना की सफलता केवल बांध, बिजली उत्पादन या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं मापी जानी चाहिए। इसके साथ *विस्थापितों का पुनर्वास, मुआवजा, किसानों की फसल की सुरक्षा और आपदा के समय त्वरित सूचना व्यवस्था* भी जरूरी है।
### प्रशासन से तत्काल सर्वे और अलर्ट सिस्टम की मांग
विस्थापित अधिकार मंच ने प्रशासन से मांग की है कि प्रभावित सभी गांवों में तत्काल स्थल निरीक्षण कराया जाए। जलजमाव की वास्तविक स्थिति और फसल नुकसान का रिकॉर्ड तैयार करने के लिए *ड्रोन सर्वे या फील्ड सर्वे* कराया जाए।
मंच ने यह भी मांग की है कि भविष्य में डैम का जलस्तर बढ़ने की स्थिति में प्रभावित गांवों के किसानों को कम से कम *24 घंटे पहले अलर्ट* करने की व्यवस्था विकसित की जाए, ताकि किसान अपनी फसल, पशुधन और जरूरी सामान को सुरक्षित करने के लिए समय रहते कदम उठा सकें।
फिलहाल डैम के जलस्तर में मामूली गिरावट जरूर आई है, लेकिन खेतों में जमा पानी और धान की फसल पर मंडरा रहे संकट के कारण किसानों की परेशानी बरकरार है। अब निगाह इस बात पर है कि जलस्तर में आगे कितनी गिरावट आती है और खेतों से पानी कब तक निकल पाता है।

