जमशेदपुर: लौहनगरी जमशेदपुर में गुरुवार सुबह उस समय हलचल मच गई, जब टाटानगर रेलवे स्टेशन के आसपास रेलवे प्रशासन ने एक बार फिर अतिक्रमण हटाओ अभियान को तेज कर दिया। स्टेशन चौक से कीताडीह रोड तक बुलडोज़र चलते रहे और 24 अस्थायी व स्थायी दुकानों को जमींदोज कर दिया गया।
सुबह से ही रेलवे प्रशासन की टीम भारी पुलिस बल के साथ स्टेशन क्षेत्र में पहुंच गई थी। स्टेशन चौक से कीताडीह रोड तक स्थित दुकानों को हटाने के लिए तीन बुलडोज़र लगाए गए। रेलवे प्रशासन का कहना है कि दुकानदारों को पहले ही नोटिस जारी किए जा चुके थे। कार्रवाई की आशंका को देखते हुए अधिकांश दुकानदारों ने पहले ही अपनी दुकानें खाली कर दी थीं।
इस वजह से रेलवे के इंजीनियरिंग विभाग को दीवारें और छतें तोड़ने में ज्यादा दिक्कत नहीं हुई। बुलडोज़र की तेज आवाज और गिरते मलबे के कारण पूरे इलाके में कुछ देर के लिए अफरा-तफरी का माहौल बना रहा।
रेलवे अधिकारियों के अनुसार, स्टेशन क्षेत्र के समग्र विकास और यात्रियों की सुविधाओं के विस्तार के लिए जमीन खाली कराना जरूरी है। आने वाले समय में स्टेशन परिसर का विस्तार, बेहतर पार्किंग व्यवस्था, सड़क चौड़ीकरण और सौंदर्यीकरण से जुड़ी योजनाएं प्रस्तावित हैं।
रेलवे प्रशासन ने स्पष्ट किया कि यह अभियान पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत चलाया जा रहा है और आगे भी चरणबद्ध तरीके से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई जारी रहेगी। सूत्रों के मुताबिक, स्टेशन रोड के बाद खासमहल रोड क्षेत्र में भी देर शाम तक करीब पांच दुकानों को तोड़े जाने की संभावना है।
किसी भी तरह के विरोध या हंगामे की आशंका को देखते हुए दंडाधिकारी की मौजूदगी में तीन दर्जन से अधिक पुलिस जवानों को तैनात किया गया था। पूरे अभियान के दौरान स्थिति नियंत्रण में रही और किसी अप्रिय घटना की सूचना नहीं मिली।
वहीं प्रभावित दुकानदारों का कहना है कि वे वर्षों से यहां कारोबार कर रहे थे और इस कार्रवाई से उनका रोजगार प्रभावित हुआ है। बताया जा रहा है कि कुछ दुकानदारों ने इस अभियान के खिलाफ उच्च न्यायालय का रुख भी किया था, लेकिन इसके बावजूद रेलवे ने तय कार्यक्रम के अनुसार अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया जारी रखी।
टाटानगर रेलवे स्टेशन क्षेत्र में चल रहे इस अभियान ने एक बार फिर विकास बनाम रोज़गार की बहस को हवा दे दी है। रेलवे इसे यात्रियों की सुविधा और स्टेशन के आधुनिकीकरण के लिए जरूरी कदम बता रहा है, जबकि प्रभावित दुकानदार अपने भविष्य को लेकर चिंतित नजर आ रहे हैं। यह पूरा मामला झारखंड में शहरी विकास और आजीविका के टकराव की एक और तस्वीर पेश करता है।

