जमशेदपुर : एमजीएम थाना क्षेत्र में पुलिस हिरासत के दौरान 22 वर्षीय जीत महतो की मौत का मामला अब गंभीर राजनीतिक और प्रशासनिक बहस का रूप ले चुका है। जमशेदपुर के सांसद बिद्युत बरण महतो ने पुलिस की भूमिका पर तीखे सवाल उठाते हुए उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यह स्वाभाविक मौत नहीं, बल्कि पुलिस प्रताड़ना का नतीजा है।
मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि मृतक के परिजनों को दिए गए दो लाख रुपये किसने और किस मद से दिए? सांसद का आरोप है कि यह राशि मामले को दबाने की कोशिश हो सकती है। वहीं पुलिस इन आरोपों से साफ इनकार कर रही है।
पुलिस के अनुसार जीत महतो को चोरी का मोबाइल खरीदने के आरोप में उठाया गया था। तबीयत बिगड़ने की जानकारी मिलते ही उसे पीआर बांड पर छोड़ा गया और मानवीय आधार पर एमजीएम अस्पताल में भर्ती कराया गया। हालांकि सवाल यह उठ रहा है कि यदि युवक को पीआर बांड पर छोड़ा गया था, तो फिर पुलिस उसे अस्पताल क्यों और कैसे लेकर गई?
परिजनों का आरोप है कि जीत महतो को पहले से गंभीर बीमारी थी, इसकी जानकारी पुलिस को दी गई थी। इसके बावजूद उसे थाने में रखा गया और समय पर इलाज नहीं कराया गया। मां का कहना है कि बेटा बार-बार तबीयत बिगड़ने की बात कह रहा था, लेकिन पुलिस ने कोई रहम नहीं दिखाया।
मंगलवार दोपहर जब पुलिस युवक को एमजीएम अस्पताल लेकर पहुंची, तब तक उसकी मौत हो चुकी थी। इससे यह संदेह और गहराता है कि युवक की मौत थाने में ही तो नहीं हो गई थी। पोस्टमार्टम और अंतिम संस्कार में जल्दबाजी पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
ग्रामीण एसपी ऋषभ गर्ग ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि युवक पहले से गंभीर बीमारियों से ग्रसित था। डॉक्टरों के अनुसार उसे ब्रेन फीवर, प्लेटलेट्स की कमी, लीवर डैमेज और पीलिया की समस्या थी। पीएम रिपोर्ट में शरीर पर किसी तरह के बाहरी चोट के निशान नहीं मिले हैं। पुलिस ने दो लाख रुपये देने के आरोप से भी इनकार किया है।
गौरतलब है कि जीत महतो की मौत के उसी दिन उसके घर बेटे का जन्म हुआ, जिसे वह कभी देख नहीं सका। यह मामला अब झारखंड में पुलिस हिरासत में मौत को लेकर एक बड़ी बहस बनता जा रहा है।

